सरकार के स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि के बावजूद घरेलू खर्च और जेब से भुगतान का भार बना हुआ है

देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि के बावजूद, घरेलू परिवारों पर स्वास्थ्य सेवाओं का वित्तीय बोझ अब भी भारी पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाया है, फिर भी ज्यादातर खर्च सीधे घरों के बजट से किया जा रहा है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए चिंता का विषय है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी खर्च में वृद्धि का उद्देश्य था स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और किफायती बनाना, जिससे सबके लिए बेहतर स्वास्थ्य मानदंड सुनिश्चित किए जा सकें। लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि घरों को अभी भी अपनी जेब से अधिकतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भुगतान करना पड़ता है। इस मुद्दे पर स्वास्थ्य अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि आउट ऑफ पॉकेट खर्च में कमी नहीं आने पर आर्थिक असमानता और बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या का एक मुख्य कारण प्राथमिक एवं निवारक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अपर्याप्त वित्तपोषण है। निवारक देखभाल जैसे टीकाकरण, स्क्रीनिंग, और स्वास्थ्य शिक्षा में पूंजी लगाने से गंभीर बीमारियों और उनका उपचार मंहगा पड़ने से बचा जा सकता है। इससे न केवल सरकारी स्वास्थ्य बजट पर दबाव कम होता है, बल्कि घरेलू खर्च भी घटता है।
आयुष्मान भारत जैसे सरकारी योजनाओं ने स्वास्थ्य सुरक्षा कवरेज में वृद्धि की है, परंतु इनके प्रभावी क्रियान्वयन और विस्तार की जरूरत बनी हुई है। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण परिवारों को अक्सर निजी क्लीनिकों पर निर्भर रहना पड़ता है, जहां लागत अधिक होती है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में स्वास्थ्य क्षेत्र पर कुल व्यय का लगभग आधा हिस्सा अभी भी घरों की जेब से खर्च होता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम भरा संकेत है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि निवारक स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक ध्यान देने और सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेश को बेहतर प्रबंधन से घरों के वित्तीय बोझ को कम किया जा सकता है।
इस संदर्भ में नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे स्वास्थ्य क्षेत्र के वित्तीय मॉडल में सुधार करें, ताकि व्यापक और टिकाऊ स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो सके। साथ ही सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को प्राथमिक और निवारक स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व के प्रति संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। इस दिशा में काम करने से ही स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का समुचित समाधान संभव हो पाएगा।




