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चीन के मेगा डैम पर संकट के बादल! ब्रह्मपुत्र पर बन रहे बांध को लेकर चीनी वैज्ञानिकों की चेतावनी, भारत की बढ़ी चिंता

बीजिंग/नई दिल्ली। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की महत्वाकांक्षी जलविद्युत परियोजना पर अब उनके ही देश के वैज्ञानिकों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी (जो भारत में प्रवेश करने के बाद सियांग और आगे चलकर ब्रह्मपुत्र कहलाती है) पर बन रहे दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत बांध को लेकर चीनी भूवैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह परियोजना एक सक्रिय फॉल्ट लाइन पर स्थित है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस क्षेत्र में भूकंप और बड़े भूस्खलन का खतरा बना रहता है, जिससे बांध और आसपास की संरचनाओं की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।

चीन की सरकारी वैज्ञानिक पत्रिका ‘सेडिमेंट्री जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी’ में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, जिस स्थान पर यह विशाल परियोजना बनाई जा रही है, वहां पैझेन फॉल्ट (Paizhen Fault) गुजरता है। यह सक्रिय भूगर्भीय दरार बांध, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे के लिए दीर्घकालिक जोखिम पैदा कर सकती है। शोध में शामिल चेंगदू यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी और चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस क्षेत्र की भूगर्भीय स्थिति अत्यंत संवेदनशील है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस इलाके की चट्टानें अपेक्षाकृत कमजोर हैं और ढीली मिट्टी के कारण बड़े पैमाने पर भूस्खलन की आशंका बनी रहती है। वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में मिलिन क्षेत्र में आए 6.9 तीव्रता के भूकंप का भी उल्लेख किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह इलाका भूकंपीय दृष्टि से अत्यधिक सक्रिय है। ऐसे में इतनी बड़ी जलविद्युत परियोजना के निर्माण को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं।

यह परियोजना बिजली उत्पादन के लिहाज से बेहद महत्वाकांक्षी मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि इसका संभावित उत्पादन क्षमता चीन के प्रसिद्ध थ्री गॉर्जेस डैम से भी लगभग तीन गुना अधिक हो सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजना की नींव सक्रिय फॉल्ट लाइन पर है, तो भविष्य में किसी बड़े भूकंप या भूस्खलन की स्थिति गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती है।

इस परियोजना को लेकर भारत पहले से ही अपनी चिंताएं व्यक्त करता रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम सहित पूर्वोत्तर राज्यों के लिए कृषि, पेयजल, मत्स्य पालन और आजीविका का प्रमुख स्रोत है। इसके बाद यही नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां करोड़ों लोग इस पर निर्भर हैं। ऐसे में नदी के प्राकृतिक प्रवाह में किसी भी बड़े बदलाव का असर व्यापक क्षेत्र पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में बांध के संचालन के दौरान जल प्रवाह में बड़ा परिवर्तन होता है या किसी आपात स्थिति में अचानक अधिक मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, तो निचले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। वहीं, लंबे समय तक जल प्रवाह कम होने की स्थिति में कृषि, पर्यावरण और जैव विविधता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, ऐसी संभावनाएं कई कारकों पर निर्भर करती हैं और इनके बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना अभी संभव नहीं है।

चीन लगातार यह कहता रहा है कि इस परियोजना का उद्देश्य केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और जलविद्युत क्षमता बढ़ाना है तथा इससे निचले देशों के जल हित प्रभावित नहीं होंगे। इसके बावजूद भारत ने समय-समय पर जल सुरक्षा, पर्यावरणीय प्रभाव और सीमा पार नदियों के प्रबंधन को लेकर अपनी चिंताएं चीन के समक्ष उठाई हैं।

चीनी वैज्ञानिकों की ताजा चेतावनी ने इस परियोजना को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने संवेदनशील भूगर्भीय क्षेत्र में बनने वाली किसी भी विशाल परियोजना के लिए पारदर्शी वैज्ञानिक मूल्यांकन, सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन और पड़ोसी देशों के साथ संवाद बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रह्मपुत्र जैसी अंतरराष्ट्रीय नदी से जुड़े किसी भी बड़े बदलाव का प्रभाव सीमाओं से परे तक महसूस किया जा सकता है।

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