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SC: अवैध कब्जों और अग्निकांडों पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, अधिकारियों से मांगा जवाब; कार्रवाई नहीं हुई तो अवमानना की चेतावनी

नई दिल्ली, दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और लखनऊ में हाल में हुई अग्निकांड की घटनाओं और अवैध कब्जों के मामलों को लेकर नगर निकायों और प्रशासनिक अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि अवैध कब्जों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित नहीं हुआ, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की पीठ अवैध कब्जों से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान अदालत ने दिल्ली के मालवीय नगर होटल अग्निकांड, लखनऊ के व्यावसायिक परिसर में लगी आग और साकेत में इमारत गिरने की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन हादसों के बाद प्रशासन से ठोस कदम उठाने की उम्मीद थी, लेकिन अब तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं दिखाई दी।

सुप्रीम कोर्ट ने नगर निकायों से पूछा कि अवैध कब्जों को हटाने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अब तक क्या प्रयास किए गए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि हादसे के बाद केवल बिल्डरों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। संबंधित क्षेत्र के प्रभारी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना भी उतना ही आवश्यक है। कोर्ट ने मालवीय नगर अग्निकांड के बाद दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई का ब्यौरा भी मांगा।

अदालत ने राजधानी के लाजपत नगर, साकेत और सरोजनी नगर जैसे क्षेत्रों का तकनीकी सर्वे कराने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने का आदेश दिया। इस समिति में आईआईटी दिल्ली के दो वरिष्ठ प्रोफेसर, दो ड्राफ्ट्समैन, एमसीडी अधिकारी और अदालत द्वारा नामित अधिकारी शामिल होंगे। समिति अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने 20 मई को जारी अपने आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें सुरक्षा मानकों को लागू करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने सवाल किया कि आदेश के बावजूद एनसीआर में अग्निकांड की घटनाएं क्यों हुईं और संबंधित अधिकारियों ने अब तक कौन-कौन से ठोस कदम उठाए।

मामले में विस्तृत रिपोर्ट तलब करते हुए सुनवाई अगली तारीख तक स्थगित कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि सार्वजनिक सुरक्षा, अवैध कब्जों और प्रशासनिक जवाबदेही के मामलों में अब केवल औपचारिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी गंभीरता से समीक्षा की जाएगी।

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