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Why were the reforms in India’s statistical database necessary? | take through

नई दिल्ली: भारत सरकार ने हाल ही में अपने आर्थिक सांख्यिकीय डेटाबेस में व्यापक सुधार और अपडेट किए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य देश की आर्थिक गतिविधियों का अधिक सटीक एवं आधुनिक आंकलन सुनिश्चित करना है। इस महत्वपूर्ण कदम से वाणिज्यिक नीतियों और आर्थिक प्रगति की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करने में सहायता मिलेगी।

प्रमुख आर्थिक संकेतकों में संशोधन

सरकार ने जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के अनुमान को अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए राष्ट्रीय खाते में आधारभूत बदलाव किए हैं। इनमें नई आर्थिक गतिविधियों को जोड़ना और पुराने आंकड़ों का पुनर्मूल्यांकन शामिल है। इसके अलावा, औद्योगिक उत्पादन के मापन में भी सुधार किया गया है ताकि उत्पादन क्षमताओं और वास्तविक उत्पादन का बेहतर आकलन हो सके।

डेटाबेस पुनर्गठन क्यों आवश्यक था?

भारत की आर्थिक संरचना में समय के साथ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, जैसे डिजिटल अर्थव्यवस्था का उदय, छोटे व मध्यम उद्यमों की भूमिका का बढ़ना तथा सेवा क्षेत्र की वृद्धि। पुराने डेटाबेस और मापन विधियों से इन परिवर्तनों को सही ढंग से पकड़ने में असमर्थता थी, जिसके परिणामस्वरूप नीति निर्धारण और विश्लेषण में त्रुटि की संभावना बनती थी। इसलिए पूरा आधारिक ढांचा पुनःनिर्मित कर आधुनिक तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल खाने वाला बनाया गया।

राष्ट्रीय खातों और जीडीपी के आंकड़ों में परिवर्तन

राष्ट्रीय खातों के सुधार में अब नए स्रोतों से अधिक विस्तृत डेटा शामिल किया गया है। इससे उपभोक्ता व्यय, निवेश, सरकारी खर्च तथा शुद्ध निर्यात के आंकड़ों में सटीकता आई है। जीडीपी की वृद्धि दर में भी इन सुधारों के कारण कुछ बदलाव देखे गए हैं, जो वास्तविक अर्थव्यवस्था की बेहतर झलक प्रस्तुत करते हैं।

औद्योगिक उत्पादन के मापन में बढ़ोतरी

औद्योगिक उत्पादन की गणना में बीते वर्षों में छोटी-छोटी इकाइयों और अनौपचारिक सेक्टर के डेटा को शामिल किया गया है। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़े उत्पादन को भी अब प्राथमिकता दी जा रही है। इससे उत्पादन के आंकड़े अधिक व्यापक और यथार्थपरक हुए हैं।

मुद्रास्फीति संकेतकों में बदलाव

मुद्रास्फीति के मापन में नई वस्तुओं और सेवाओं को शामिल किया गया है, जो वर्तमान उपभोक्ता व्यवहार को बेहतर प्रदर्शित करते हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) और थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधारों को संशोधित किया गया है जिससे अर्थव्यवस्था में महंगाई की वास्तविक स्थिति को समझना आसान होगा।

इन सभी परिवर्तनों से भारत की आर्थिक नीतियों और विकास की रणनीतियों को अधिक विश्वसनीय डेटा के आधार पर तैयार करने में मदद मिलेगी। सरकार का यह कदम देश की आर्थिक प्रगति को मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

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