भारत में यूवी इंडेक्स बढ़ रहा है: क्या हमारे सनस्क्रीन्स इसके साथ क़दम से चल रहे हैं

देश के विभिन्न हिस्सों में यूवी इंडेक्स के उच्च स्तर दर्ज किए जा रहे हैं, जिससे त्वचा संबंधी समस्याओं में इजाफा हो रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो इस बढ़ते यूवी रेडिएशन के कारण पिगमेंटेशन, तैलीयपन, और समय से पहले उम्र बढ़ने की शिकायतें बढ़ रही हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हमारे सनस्क्रीन उत्पाद इन नए वातावरण के अनुरूप प्रभावी रूप से त्वचा की सुरक्षा कर पा रहे हैं?
डर्मेटोलॉजिस्टों का कहना है कि भारत में लगातार बदलती जलवायु और सौर विकिरण की तीव्रता ने त्वचा की सुरक्षा के लिहाज से सनस्क्रीन की भूमिका को और अहम बना दिया है। विशेषज्ञों ने लोगों को नियमित रूप से उच्च एसपीएफ वाली सनस्क्रीन लगाने की सलाह दी है। डॉक्टर रिया सक्सेना के अनुसार, “अब केवल यूवीए और यूवीबी से सुरक्षा पर्याप्त नहीं है, बल्कि हाई एनर्जी विजिबल (HEV) लाइट से भी बचाव जरूरी है।”
इतना ही नहीं, भारतीय त्वचा के लिए खास तौर पर डिज़ाइन किए गए सनस्क्रीन तेजी से बाजार में अपनी लोकप्रियता बढ़ा रहे हैं। ग्लोबल ब्रांड्स के साथ-साथ देशी कंपनियां भी ऐसे उत्पाद विकसित करने में लगी हैं जो न केवल तेज़ ग्रीष्मकालीन सूरज की किरणों से सुरक्षा करते हैं बल्कि भारतीय तैलीय व मिश्रित त्वचा के अनुरूप कम चिकनाहट वाले और जल्दी सूखने वाले होते हैं।
मार्केट रिसर्च के अनुसार, सनस्क्रीन उद्योग में इन दिनों यह नवाचार ग्राहकों को आकर्षित कर रहा है और उनकी बदलती आवश्यकताओं के अनुसार उत्पाद पेश करने पर जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सतत अनुसंधान और तकनीकी उन्नति से वेगशील जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटना सरल होगा।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि आम जनमानस में त्वचा सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय और विभिन्न मीडिया प्लेटफार्मों के अभियान लोगों को नियमित सनस्क्रीन उपयोग की ओर प्रेरित कर रहे हैं। इसके बावजूद, कई स्थानों पर सनस्क्रीन के गलत या कम उपयोग के कारण त्वचा रोग बढ़ने का खतरा बरकरार है।
अंत में, यह कहना उचित होगा कि भारत के बढ़ते यूवी इंडेक्स को देखते हुए सही और प्रभावी सनस्क्रीन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। उपभोक्ताओं को अपनी त्वचा के प्रकार के मुताबिक उपयुक्त सनस्क्रीन चुनना चाहिए और सूरज की किरणों से बचाव के लिए अन्य सावधानियां भी बरतनी चाहिए। त्वचा की सुरक्षा से जुड़ी इस चुनौती में विज्ञान, उद्योग और समाज के सम्मिलित प्रयास से बेहतर परिणाम संभव हैं।




