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S-400 पर तुर्किए की नई रणनीति! खाड़ी देशों को रूसी मिसाइल बेचकर F-35 कार्यक्रम में वापसी की कोशिश

अंकारा, तुर्किए

तुर्किए एक बार फिर अपने रूसी S-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अंकारा अपने S-400 सिस्टम को किसी खाड़ी देश, विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) या कतर, को बेचने की संभावना पर विचार कर रहा है। माना जा रहा है कि यदि यह सौदा सफल होता है तो तुर्किए के लिए अमेरिका के F-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम में दोबारा शामिल होने की राह आसान हो सकती है। हालांकि इस संभावित सौदे के सामने कई राजनीतिक, कानूनी और रणनीतिक चुनौतियां भी मौजूद हैं।

तुर्किए ने वर्ष 2017 में रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने का समझौता किया था और 2019 में इसकी डिलीवरी मिली। इस खरीद को लेकर अमेरिका और नाटो ने कड़ी आपत्ति जताई थी। अमेरिका का कहना था कि S-400 जैसे रूसी रक्षा सिस्टम को नाटो नेटवर्क के साथ जोड़ने से F-35 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान की संवेदनशील तकनीक की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसी विवाद के चलते अमेरिका ने तुर्किए को F-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया और उस पर CAATSA के तहत प्रतिबंध भी लगाए।

अब खबरें हैं कि तुर्किए इस S-400 सिस्टम को किसी तीसरे देश को बेचने का विकल्प तलाश रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ते सुरक्षा तनाव और विशेष रूप से ईरान से संभावित खतरे को देखते हुए संयुक्त अरब अमीरात इस प्रणाली में रुचि दिखा सकता है। वहीं कतर का नाम भी संभावित खरीदारों की सूची में चर्चा में है। हालांकि अभी तक तुर्किए, यूएई या कतर की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तुर्किए वास्तव में S-400 बेचता है, तो इससे अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में सुधार की संभावना बढ़ सकती है। लंबे समय से अंकारा F-35 कार्यक्रम में दोबारा शामिल होने और रक्षा सहयोग को सामान्य करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि केवल S-400 बेच देना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि अमेरिका की ओर से अंतिम निर्णय कई सुरक्षा और रणनीतिक पहलुओं को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।

इस संभावित सौदे की सबसे बड़ी चुनौती रूस की मंजूरी मानी जा रही है। S-400 जैसे उन्नत रक्षा सिस्टम को किसी तीसरे देश को बेचने के लिए रूस की सहमति आवश्यक हो सकती है। इसके अलावा अमेरिका और नाटो भी इस बात पर नजर रखेंगे कि यह प्रणाली किस देश को और किन शर्तों पर हस्तांतरित की जाती है।

यदि यह सौदा आगे बढ़ता है तो इसका असर केवल तुर्किए और अमेरिका के संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था और क्षेत्रीय सामरिक संतुलन पर भी पड़ सकता है। फिलहाल यह मामला अटकलों और कूटनीतिक चर्चाओं के स्तर पर है तथा संबंधित देशों की ओर से किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं की गई है।

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